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रहै जोकर परिवार : जगदीश प्रसाद मण्डल

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रहै जोकर परिवार बैशाख मास। भोरे-भोर रघुनी भाय पहुँचला। अपनो सुति कऽ उठले रही। रघुनी भायकेँ देखिते बजलौं- “ भाय साहैब , भोरे-भोर किमहर सवारी निकलल अछि ?” रघुनी भाय बजला- “ राधे श्याम , तोरेसँ भेँट करए एलौं हेन.. !” काल्हि साँझोमे रघुनी भाय भेटल छला , मुदा किछु कहलैन नहि तँए मनमे तारतम्य हुअ लगल जे जँ कोनो तेहेन काज रहितैन तँ साँझेमे कहने रहितैथ मुदा साँझमे किछु कहलैन नहि आ रातिमे कोन एहेन बात भऽ गेलैन जे भोरे-भोर आबि गेला हेन ! बजलौं- “ किए ?” रघुनी भाय बजला- “ राधे श्याम , अदहा जिनगी बीत गेल मुदा अखन तक कोलकाता नहि देखलौं हेन। रातिमे एकाएक मनमे उठल जे देखिते-देखिते लोकक जिनगी बीत जाइए मुदा दुनियोकेँ देखि नहि पबैए। ” रघुनी भाइक विचार सुनि मनमे भेल जे रघुनी भाय ठीके कहै छथि। अपनो उमेर दिस तकलौं तँ बुझि पड़ल जे खाली रघुनीए भाइक अदहा उमेर नहि बितलैन , अपनो तँ बीतिये गेल अछि। अपनो ने कहियो कोलकाता गेलौं हेन। ऐठाम एकटा प्रश्न अछिए जे ‘ अदहा उमेर ’ केकरा कहबै ? जन्मक ठेकान तँ अछि जे फल्लॉंक जन्म फल्लॉं दिन भेल मुदा मृत्युक तँ ठेकान नहियेँ अछि जे के कहिया मरत तखन अदहा उमेर ...

एकलव्यपन

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  एकलव्यपन कनी देरीसँ नीन टुटने कनी अबेर-के उठलौं। अखन तकक अपन उठब यएह रहल अछि जे सुर्ज उगैसँ घन्टाभरि पहिने उठलौं आ माल-जालकेँ घरसँ बहार करैत , दुआर-दरबज्जा बहारि पछाइत अपना ऐठामसँ निकललौं। गाम-समाजमे किछुओ परिवार तँ एहेन भइये गेल अछि जे अप्पन पानिक संग अप्पन परो-पैखानाक बेवस्था कइये लेलैन अछि , तहीमे अपनो छी। पाँच साल पूर्व तक सुति-उठि माल-जालकेँ घरसँ बहार क ऽ , आगूमे खाइले दऽ दइ छेलिऐ आ अपने दिशा-मैदान दुआरे मन्ना चौर दिस , माने चौरी दिस , गहींरका खेतक इलाका दिस , विदा होइ छेलौं। मन्ना चौर अप्पन गामक पूबरिया चौर छी , जेकरा बीचमे अनेको कोचाढ़ि [1] सेहो खुनल अछि , जइमे बरसातक तँ कोनो बाते नहि जे जेठो-अखाढ़ तक पानि भरल रहिते अछि। ओम्हरे जाइ छेलौं , दिशा-मैदानक पछाइत झौआक दतमैन तोड़ि दतमैन करै छेलौं आ तखन घरपर आबि दुआर-दरबज्जाक बाहरन-सोहरन करैत रही , मुदा एमहर पाँच बर्खसँ रूटिंग बदैल गेल अछि। अबेर-के सुतने उठैमे अबेर भइये गेल छल। कहब जे अहाँ तँ समयकेँ पकैड़कऽ चलैबला छी , तखन सुतै-उठैमे एना अबेर किए भेल ? अबेर होइक कारण भेल जे जहिना घटही गाड़ी , घटही गाड़ीक माने ई बुझू जे घट...