PAGHALAIT HIMKHAND BY DR. S.K.PRASAD
ISBN : 978-93-87675-69-8
Published by : Pallavi Parkashan
Tulsi Bhawan, J.L.Nehru Marg, Ward No. 06, Nirmali, District- Supaul, Bihar : 847452
Mobile : 8539043668, 9931654742
Price : 150/-
Copyright © Original-
Author
Copyright © Translation-
Translator
First published 2018
Typeset
and Printed By : Manav
Arts, Nirmali (Supaul)
Cover
: The Sahu Printing press. Nirmali (Supaul) Pin : 847452
PAGHALAIT HIMKHAND
Maithili translation of ‘Paighalte
Himkhand’
An Anthology of Hindi Poems by Rajni Chhabra from
Hindi into Maithili by Dr. Sheo Kumar Prasad.
All rights reserved. No Part of this publication may be reproductd
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author and the publisher.
अनुसृजन:
साहित्यिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान
साहित्य सृजन मन के
भावों को उकेरने का माध्यम है और अनुवाद इन भावात्मक छवियों को अपनी भाषा के शब्द
शिल्प में बांधकर और विस्तार देने का सशक्त साधन/
लेखन में
भावाभिव्यक्ति जब दिल की गहराईयों से उतरती है, भाषा और प्रदेश के बंधन तोड़ती
हुई, सुधि पाठकगण के मन में गहनता से स्थान बना लेती है।
यहाँ मैं यह बात अपने हिन्दी काव्य संग्रह ‘पिघलते हिमखण्ड’ के सन्दर्भ में कह रही हूँ। इस काव्य कृति की चुनिन्दा कविताओं के
नेपाली, बंगाली, पंजाबी, राजस्थानी, मराठी, गुजराती में अनुवाद की श्रृंखला में एक
विशिष्ट कड़ी जुड़ गयी है; सम्पूर्ण काव्य संग्रह का मैथिली अनुवाद और यह सराहनीय
अनुसृजन डॉ.शिव कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर हिन्दी, भू.ना. मण्डल विश्व विद्यालय,
मधेपुरा (बिहार) के अथक प्रयासों का परिणाम है।
व्यक्तिगत रूप से डॉ
शिव कुमार से कोई परिचय नहीं था। फेसबुक की आभासी दुनिया के माध्यम से जान पहचान
हुई। मैंने आज तक अपने प्रथम हिन्दी काव्य संग्रह ‘होने से न होने तक’ के अलावा अपनी अन्य मौलिक और अनुसृजित काव्य कृतियों का कभी भी औपचारिक
लोकार्पण नहीं करवाया। सोशल मीडिया पर ही पाठक गण को अपनी कृतियाँ लोकार्पित किया
करती हूँ। बहुत से साहित्यिक प्रवृति के मित्रों व् प्रकाशकों से परिचय हुआ फेसबुक
के माध्यम से। डॉ.शिव ने भी मेरी कुछ रचनाएँ फेसबुक पर देखी, जिन में से ‘पिघलते हिमखण्ड’ की रचनाएँ उन्हें काफी पसंद आयी और
उन्होंने इस काव्य संग्रह की मैथिली में अनुवाद करने की इच्छा जतायी, जिसे मैंने
सहर्ष स्वीकारा। यह उनकी निष्ठा और कार्य के प्रति समर्पण का ही फल है की इतने
अल्प समय में इतना प्रभावी अनुसृजन हो पाया है। मूल रचनाकार के मनोभावों को
आत्मसात करना और उस में अपनी भाषा में अभिव्यक्त करते हुए शोभा में वृद्धि करना कोई
आसान काम नहीं है; परन्तु डॉ शिवकुमार से इस अनुवाद कार्य को बहुत सहजता से सम्पन्न किया।
यदि आप इन कविताओं को
मैथिली में पढेंगे तो ऐसा आभास होगा जैसे कि यह मूलतः मैथिली में ही लिखी गयी हों।
यह अनुसृजनकर्ता की अत्यन्त प्रशंसनीय उपलब्धि है। कुछ चुनिन्दा रचनाओं का आनन्द
आप भी लीजिये, मूल हिन्दी और अनुदित मैथिली रचना-
मधुबन
कतरा
कतरा
नेह के
अमृत से
बनता पूर्ण
जीवन कलश
यादों की
बयार से
नेह की
फुहार से
बनता जीवन।
मधुबन
मधुबन
बुन्न बुन्न
नेहक अमिय सँ
जिनगीक घैल
भरैत छै।
स्मृतिक
बसात आ
नेहक फुहार सँ
बनैत छै
जिनगीक मधुबन।
यह कैसा सिलसिला
कभी कभी दो कतरे नेह
के
दे जाते हैं सागर सा
एहसास
कभी कभी सागर भी
प्यास बुझा नहीं पाता
जाने प्यास का यह
कैसा है
सिलसिला और नाता।
ई केहन सत्तैर
कखनहुँ तऽ नेहक दू बुन्न
दऽ जाएत छै सिन्धु सन तोष
कखनहुँ समुद्रो
पियास नहि मेटा पबैत छै
नै जानि पियासक ई केहन
सत्तैर आ नाता छै!
क्या जानें
बिखरे हैं आसमान में
ऊन सरीखे
बादलों के गोले
क्या जाने, आज ख़ुदा
किस उधेड़ बुन में हैं।
की जानि
छितराएल छै अकाश मे
ऊँन सन
मेघक गोला
की जानि आइ परमतमो
कोन गुण धुन मे लागल छैथ!
मैथिली अनुवाद सुधि पाठकों को सौंपते
हुए, प्रभु से कामना करती हूँ कि डॉ. शिव कुमार की अनुदित कृति साहित्य जगत में
विशिष्ट पहचान बना पायें। हृदय से आभरी हूँ अनुसृजनकर्ता की जिनके माध्यम से मेरे हिन्दी
काव्य संग्रह ‘पिघलते
हिमखण्ड’ को साहित्यिक रूप से समृद्धभाषा मैथिली में विस्तार
मिल रहा हैं। इस काव्य गुच्छ की सुरभि कहाँ कहाँ पहुँची, जानने की उत्सुकता और
आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
रजनी छाबड़ा
बहुभाषीय कवियत्री व् अनुवादिका
गुरुग्राम (हरयाणा)
आमुख आ आभार
रहलहुँ सभ दिन भावक भूखल
भावक नेसलहुँ दीप
भाव बिना जिनगी छै
सुन्ना
भावे जरए नव दीप।
एहि पोथिक मूल रचना
करएवाली फेसबुक मित्र कवयित्री बहुभाषाविद् विदुषी रजनी छावड़ा केर सतत प्रोत्साहन
आ सहयोगसँ ई पोथी पूर्ण भेल अछि। हुनक प्रतिभा आ लगनकेँ पॉंखि लागल रहैन।
अपन महावद्यालयक सभ
समांगकेँ एहि अवसरपर हृदयसँ आभार ज्ञापित करैत छी जे एहि काजमे विविध रूपेँ सहयोग केलाह अछि।
संगे, दु:ष्कर काज
पल्लवी प्रकाशनक कर्यकता गणक रहलैन। उमेशजी, हुनक पत्नी-
पुनम (हमर पुतोहु), पल्लो,
तुलसी आ सुटकलहा पोता- मनु केर आवभगत एहि पोथिक प्रकाशन हेतु हमर
सम्वल बनल। तँए, एहि परिवारकेँ हमर बहुत-बहुत सिनेह आ
आशीष...।
एहि अवसरपर फेसबुक मित्र
जिनक टिप्पणी तथा सुझाव भेटैत रहल हुनका प्रति हृदयसँ आभारी छी। एहि अवसरपर अपन
अग्रजक संग-संग श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आशीषक अभिलाषी छी।
ई भाव पुष्प सुधि पाठक
समक्ष समर्पित अछि। आग्रह जे सुझाव, समीक्षा आ त्रुटि दिस अवश्य धियान दियाबी...।
शिव
कुमार प्रसाद
31 मार्च 2018
निर्मली।
काव्य-क्रम
1. मधुबन 19
2. बन्दगी 20
3.
उन्मुक्त 21
4.
ई सेहन्ता 22
5.
खाली अप्पन 23
6.
बन्हकी 24
7.
की जानि 25
8.
परिचय 27
9.
अप्पन दियारी 28
10.
मनक बन्न केबाड़ 29
11.
घा 31
12.
बहुत अछि 32
13.
वौआइत मन 33
14.
अहाँ बिनु 34
15.
केकरा चिन्ता रहै छै 35
16.
सन्तोषमे ओ सुआद केतऽ! 36
17.
अकास भरल छै 37
18.
बेसुध 38
19.
नारी 39
20.
एकटा हेराएल जनानी 41
21.
राजभाषा 44
22.
विद्याक बाट 46
23.
आजुक नारी 48
24.
हम केतए छेलौं 49
25.
बिसवास 52
26.
मनक कनकौआ 54
27.
घर 56
28.
सुनसान 57
29.
कुहेस
58
30.
साँचक धरातल 59
31.
एहि प्रकारें 61
32.
नेनपनक घुमब 62
33.
मेलामे एसगर 63
34.
हमहुँ जीबि रहल छी 64
35.
लहैर 66
36.
मनक बजार 67
37.
जिनगीसँ की चाहै छी 68
38.
केहेन भटकब 70
39.
बेमन जिनगी 71
40.
हिमखण्ड 72
41.
ई केहन सत्तैर 73
42.
बन्न ठोर 74
43. केना बिसैर सकै छी? 75
44. घरक पाग 76
45. खेलौना सन 79
46. घर आओर मकान 80
47. एहेन कोन जीयब 81
48. बहए दियौ जिनगीकेँ 82
49. ई केहेन नाता 83
50. मन विहग 85
51. कचोट 86
52. स्मृति 87
53. आसक चिड़ै 88
54. साँसक संग 89
55. चर्चा 91
56. दिगंतक नजीक 92
57. केहेन उपराग 93
58. सुख-दुख 94
59. आन 96
60. कारण 97
61. सतरंगा आनन्द 98
62. अहाँक थाती 100
63. बिसबासक मूर्ति 102
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